कोरोना वायरस की वजह से मांग में कमी को लेकर पहले से ही तेल की क़ीमतों में गिरावट देखने में आ रही थी, लेकिन सोमवार को जैसे ही एशिया में व्यापार शुरू हुआ, तेल की क़ीमतें 30 फ़ीसद तक गिर गईं, जो 1991 में फ़ार्स खाड़ी युद्ध के बाद से सबसे कम है।
ब्रेंट 33.31 डॉलर प्रति बैरल तो पश्चिम टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) 29.72 डॉलर लुढ़क गया, दोनों में लगभग 50 प्रतिशत तक की गिरावट हुई है।
कोरोना वायरस महामारी फैलने के कारण पहले ही बुरी स्थिति का सामना करने वाले एशियाई शेयर बाज़ार, तेल की क़ीमत में भारी गिरावट के कारण सोमवार को औंधे मुंह गिर पड़े।
जापान का निक्केई सूचकांक पांच प्रतिशत तक गिर गया, जबकि ऑस्ट्रेलिया का एएसएक्स 7.3 प्रतिशत और मुम्बई सेंसेक्स शुरुआती घंटों में 1600 अंक तक या क़रीब 4.2 प्रतिशत तक गिर गया, जबकि निफ्टी में 453 अंकों या 3.9 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई।
कोरोना वायरस से प्रभावित बाज़ार में संतुलन उत्पन्न करने के लिए पिछले हफ़्ते सऊदी अरब के नेतृत्व में तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक और रूस के बीच उत्पादन में कटौती को लेकर सहमति नहीं बन सकी थी।
सऊदी अरब चाहता था कि रूस अपने तेल उत्पादन में कमी कर दे ताकि कच्चे तेल के दाम स्थिर रहें, लेकिन दूसरे सबसे बड़े तेल उत्पादक ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद रियाज़ ने पिछले दो दशकों के दौरान तेल की क़ीमतों में सबसे बड़ी कटौती करके, बाज़ार में भूकम्प पैदा कर दिया।
इसका असर सऊदी अरब के बाज़ार पर भी हुआ है। सऊदी सरकारी तेल कंपनी आरामको के शेयरों में भारी गिरावट देखने में आई है।
रूस द्वारा तेल उत्पादन में कटौती करने से इनकार के बाद, सऊदी अरब ने पहले ही धमकी दी थी कि वह अप्रैल में अपने तेल उत्पादन में 20 लाख बैरल प्रतिदिन तक की बढ़ौतरी कर देगा।